कुत्ते मुस्कुराते हैं मगर उन कारणों से नहीं जिनके चलते हम इंसान मुस्कुराते हैं.
प्राणी विज्ञानी जॉन ब्रैडशॉ बताते हैं कि कुत्ता अपने मालिक से थोड़ा प्यार पाने के लिए मुस्कुराता है.
इसलिए
ज़रूरी नहीं कि वे मुस्कुरा रहे हों तो हम समझें कि वे खुश हैं. ये एक
संकेत हो सकता है कि वे थोड़े बेचैन हैं और आपसे थोड़ा दिलासा या हिम्मत
चाहते हैं.
तो जब कभी आपको अपना डॉगी मुस्कुराता नज़र आए तो उसे दुलारना न भूलें.
कुत्तों को यह अहसास नहीं होता कि उन्होंने कुछ ग़लत कर दिया है.
हालांकि हमें ऐसा लग सकता है, जब वे शर्मिंदा होने जैसा चेहरा बनाते हैं.
बहुत
सारे लोग बताते हैं कि कैसे उनका कुत्ता 'गिल्टी लुक' देता है. मगर
विज्ञान बताता है कि कुत्ते उस समय सामने खड़े आदमी की बॉडी लैंग्वेज के
आधार पर ऐसी प्रतिक्रिया देते हैं.
अपराध बोध दरअसल एक पेचीदा भाव
होता है जिसे कुत्ते नहीं समझ सकते. ऐसे में कुत्ते गिल्टी लुक देते समय
दरअसल इस बात को लेकर डरे हुए होते हैं कि उन्हें सज़ा मिल सकती है. मगर उन्हें यह पता नहीं होता कि उन्होंने कुछ ग़लत किया है.
जब एक बार पिल्ले को यह पता चल जाता है कि इंसानों का स्वभाव दोस्ताना
होता है, उसका स्वाभाविक ज्ञान उसे बताता है कि इस व्यक्ति के साथ रहने में
ही उसके जीवित रहने की ज्यादा संभावनाए हैं.
यही कारण है कि कई
कुत्ते तब परेशान हो जाते हैं जब उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है. वे दूर
की नहीं सोच पाते और उन्हें ऐसा लग सकता है कि मालिक ने उन्हें हमेशा के
लिए छोड़ दिया है. शनल जियोग्राफ़िक के अनुसार इंसानों के साथ रहने के कारण कुत्तों में विलियम्स सिंड्रोम जैसा ही एक सिंड्रोम पैदा हो जाता है.
अगर
इंसानों में और नाम के जीन्स न हों तो उन्हें विलियम्स
सिंड्रोम हो जाता है. यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें लोगों को समझने में
मुश्किल आती है और उन्हें 'पूरी दुनिया को प्यार करने की आदत' पड़ जाती है.
अगर
कुत्तों में देखें तो उनके
बहुत सारे स्तनधारी जीव प्यार, डर, बेचैनी और खुशी जैसे बुनियादी भावों
को महसूस करते हैं. मगर यह पता चला है कि कुत्ते इंसानों के लिए और भी
अलग-अलग तरह की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं देते हैं.
बहुत सारे लोगों
को लगता है कि उनके कुत्ते उन्हें प्यार करते हैं. अब वैज्ञानिकों ने पाया
है कि कुत्तों का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि वे किसी कितना प्यार
करते हैं.
एमॉरी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ग्रेगरी बर्न्स ने
कुत्तों को एमआरआई के दौरान स्थिर खड़े रहने के लिए ट्रेन किया. यह देखने
के लिए कि मालिक की तस्वीरें देखने पर होने वाली खुशी पर उनका दिमाग़ किस
तरह की प्रतिक्रिया देता है.
पाया गया कि कुत्ते इंसान की बॉडी लैंग्वेज को चिम्पैंज़ियों से बेहतर समझते हैं.
और नाम के जीन्स अलग होते हैं.
इसी कारण वे इंसानों के संपर्क में आकर ज़्यादा दोस्ताना हो जाते हैं.
अगर कोई कुत्ता अपने जीवन के शुरुआती तीन महीनों में किसी इंसान के संपर्क में नहीं आता है तो वह ताउम्र जंगली रह सकता है.
इसका
उदाहरण ऑस्ट्रेलियन डिंगो नाम के कुत्ते हैं जो करीब 4000 साल पहले तक
पालतू हुआ करते थे. मगर इस द्वीप पर अकेले छोड़ दिए गए ये कुत्ते अब जंगली बन गए हैं.
दुनिया भर के कई देशों में अमीर और संपन्न लोगों को सुगर डैडी बनाने का
चलन है. सुगर डैडी का मतलब क्या है, इसे समझना उतना मुश्किल भी नहीं है.
दरअसल,
युवा लड़कियां अपने ऐशोआराम और सुख सुविधाओं के लिए पैसों की व्यवस्था
करने वाले किसी डैडी नुमा शख़्स की तलाश कर लेती हैं, जिनके साथ वो समय भी
बिताती हैं तो उस शख़्स को सुगर डैडी कहा जाता है.
सुगर डैडी बनाने का ये चलन इन दिन कीनिया को अपने चपेट में लिए हुए है.
इसे सेक्स के कारोबार का नया रूप भी कहा जा रहा है, लेकिन बुनियादी फर्क क्या है, ये जानने के लिए पहले इवा से मिल लीजिए.
नैरोबी
एविएशन कॉलेज में पढ़ने वाली 19 साल की इवा अपने छोटे से कमरे में बेचैन
दिखती हैं. उनके पास महज 100 कीनियाई शीलिंग है और उन्हें अपने आने
इवा तैयार हो कर बाहर निकलती हैं, बस लेकर सिटी सेंटर पहुंचती हैं और
वहां अपने साथ सेक्स करने वाले शख़्स की तलाश करती हैं, दस मिनट के अंदर ही
उन्हें ऐसा पुरुष मिल जाता है जो सेक्स करने के बदले में 1000 केनियाई
शेलिंग इवा को देने को तैयार है.
इवा के ठीक उलट है शिरो की ज़िंदगी. शिरो छह साल पहले यूनिवर्सिटी में
पढ़ती थीं, यही कोई 18-19 साल की उम्र रही होगी. तब शिरो एक शादी शुदा
शख़्स से मिली जो उनसे 40 साल बड़ा था. पहली मुलाकात में उसने शिरो को कुछ
तोहफे दिए. फिर सैलून ले गया. दो साल के संबंध के बाद उसने शिरो को एक
अच्छा अपार्टमेंट दिला दिया.
चार साल के अंदर शिरो के लिए उसने
नियारी काउंटी में एक भूखंड ले लिया है. इन सबके बदले में वह जब चाहता है
तब शिरो के साथ सेक्स करता है. अब आप समझ ही चुके होंगे कि शिरो ने अपने
लिए एक सुगर डैडी तलाश लिया है.
केनियाई समाज में शिरो जैसी लड़कियों
की संख्या बढ़ती जा रही है, जो सोशल प्लेटफ़ॉर्म से लेकर बार, रेस्टोरेंट
सब जगह नज़र आने लगी हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ नैरोबी से पढ़ने वाली सिलास नयानचावनी बताती हैं,
"शुक्रवार की रात यूनिवर्सिटी हॉस्टल के बाहर देखिए, किसकी कार नहीं आती-
मंत्रियों की, नेताओं की सब के ड्राइवर आकर युवा लड़कियों को ले जाते हैं."
हालांकि अब तक इस तरह का कोई आंकड़ा नहीं आया है, जिससे ये पता चले
कि कितनी लड़कियां सुगर रिलेशन में हैं. लेकिन बीबीसी अफ़्रीका की ओर से
बोसारा सेंटर फॉर बिहेवयरियल इकॉनामिक्स ने एक अध्ययन किया है जिसमें 18 से
24 साल की 252 छात्राएं शामिल हुईं, इनमें 20 फ़ीसदी छात्राओं ने अपना
सुगर डैडी बनाया हुआ था. वहीं युवा लड़कियां ये मानती हैं कि उनके साथियों
में क़रीब 24 फ़ीसदी साथियों के सुगर डैडी.
ये सैंपल साइज बहुत छोटा है, लेकिन इससे कीनियाई समाज के इस बदलाव के संकेत ज़रूर मिल रहे हैं.
ऐसी
ही एक लड़की है 20 साल की जेन. जेन ने अपने लिए दो-दो सुगर डैडी तलाशे हुए
हैं. ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही जेन बताती हैं कि उनके टॉम और जेफ़ से अलग
अलग संबंध हैं.
जेन कहती हैं, "वे मदद करते हैं, लेकिन हमेशा सेक्स के बदले ही नहीं. कई बार उन्हें बात करने के लिए, साथ रहने के लिेए भी कोई
चाहिए होता है."
जेन के मुताबिक उसने आर्थिक सुरक्षा के लिए ये फ़ैसला लिया ताकि वह अपने
से छोटी बहनों की मदद कर सकें. ऐसी ही लड़कियों की कहानी नैरोबी डायरी
नामक रियलिटी टीवी शो में दिखाई जा रही हैं.
वाले
दिनों के ख़र्च की चिंता हो रही है.
जेन की तरह ही ब्रिजेट भी है. नैरोबी के झुग्गी झोपड़ी वाले इलाक़े
काइबेरा में रहती हैं. वे घरों में काम करने वाली महिला थी, लेकिन अब सोशल
मीडिया पर उनकी धमक है. उन्होंने अपना एक सेक्सी वीडियो शूट किया है, इसके
बाद उनकी फॉलोइंग काफ़ी बढ़ गई है.तना ही नहीं, सुगर रिलेशन के बाद उनकी दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है. एक
से एक महंगे ब्रैंड के कपड़े और बैग. ब्रिजेट के मुताबिक वे अपने जीवन में
गुड लाइफ़ का टेस्ट लेना चाहती हैं.
25 साल की ग्रेस भी इन्हीं लोगों
में शामिल हैं. उत्तर नैरोबी में रहने वाली ग्रेस सिंगल मदर हैं. उनका
सपना सिंगर बनने का है. वे नाइट क्लब में गाती हैं लिहाजा वह ऐसे पुरुष से
संबंध बनाना चाहती हैं जो उनका करियर बनाने में भी मदद कर सके.
हालांकि इस चलन पर सवाल भी ख़ूब उठ रहे हैं. लोगों का कहना है कि इस
संस्कृति से महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होने वाला है बल्कि ये एक तरह से उस
चलन को बढ़ावा देना है जिसके चलते महिलाओं के शरीर का इस्तेमाल पुरुष आनंद
के लिए कर रहे हैं.
वहीं महिलावादी चिंतक ओयंगा पाला का ये भी
मानना है कि अफ्रीका में महिलाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा लगातार ज़ोर पकड़
रहा है, ऐसे में जो लोग सेक्शुअली एक्टिव हैं, उनको तो इस चलन से लाइसेंस
मिल जा रहा है.
पिछले साल 10 जुलाई को अनुभूति शांडिल्य 'तीस्ता' ने अपने फ़ेसबुक पेज
पर सावन को समर्पित ये लाइनें लिखी थीं. कमेंट बॉक्स में संजय कुमार पांडेय
नाम के एक शख़्स के पूछने पर कि इस गीत का ऑडियो वर्जन कब आएगा, तीस्ता ने
जवाब दिया था कि जल्दी ही निकलने वाला है.
अब तो इस साल का सावन भी बीत गया, लेकिन इस गीत का ऑडियो कहां है? पता
कैसे चलेगा? फ़ेसबुक स्क्रॉल करते-करते नज़र तीस्ता के भाई उद्भव शांडिल्य
की एक पोस्ट पर गई. इस साल के सावन के बीत जाने के अगले दिन यानी 27 अगस्त
को उद्भव फ़ेसबुक पर लिखते हैं-
"लौट आओ मेरी अपराजिता"
भैया तुमसे साहित्य पढ़ने आया है और तुम्हारे लिए ब्रिटैनिया का केक भी लाया है.
27
अगस्त की शाम उद्भव शांडिल्य पटना एम्स में भर्ती अपनी बहन तीस्ता को
देखने गए थे. तब तक डॉक्टरों ने कह दिया था शरीर के सारे ऑर्गन फेल हो चुके
हैं. केस अब हाथ के बाहर है. फिर भी भाई उद्भव को न जाने क्यों लग रहा था
कि बहन जिसको वह "अपराजिता" कहा करता था, लौट कर आएगी.पिछले एक हफ़्ते से सोशल मीडिया पर सक्रिय भोजपुरिया समाज जिस तीस्ता की
सलामती की दुआएं मांग रहा था, जिस तीस्ता के लिए लोकगायिका पद्म श्री शारदा
सिन्हा और भोजपुरी के लोकप्रिय गायक भरत शर्मा "व्यास" सरीखे कलाकारों ने
भी मदद के लिए गुहार लगाई थी और जिस तीस्ता की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया
पर यह पढ़ने को मिल रहा था-
पिता उदय नारायण सिंह ने फ़ेसबुक पर 28 अगस्त की शाम एक पोस्ट लिखी था. उन्होंने लिखा कि "तीस्ता ना रहली (तीस्ता नहीं रही)".
उनके
इतना कहने के बाद से ही सोशल मीडिया पर लोग तीस्ता को श्रद्धांजलि देने
लगे हैं. बिहार और भोजपुर के कला जगत से जुड़े लोग तीस्ता के जाने को
लोकागाथा गायन की संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति बता रहे हैं.
तीस्ता
का असल नाम अनुभूति शांडिल्य है. उम्र महज 17 साल. इसी साल बिहार बोर्ड से
12वीं की परीक्षा पास की थीं. फ़ेसबुक से जो कुछ पता चल पाया उसके अनुसार
"तीस्ता" लोकगाथा गायन की पारंपरिक व्यास शैली का पालन करते हुए कुंवर सिंह
की वीरगाथा गाती थीं.
बिहार में छपरा ज़िले के रिविलगंज की रहने वाली तीस्ता के पिता उदय
नारायण सिंह ख़ुद भी संगीत के शिक्षक हैं. कई कार्यक्रमों में आयोजित
तीस्ता की प्रस्तुतियों में मंच पर वो भी अपनी बेटी के साथ नज़र आते थे.
महज
13 साल की उम्र में तीस्ता ने पहली बार मैथिली-भोजपुरी अकादमी की तरफ़ से
आयोजित एक कार्यक्रम में अपनी गायन शैली और भावपूर्ण नृत्य की प्रस्तुति से
सबका दिल जीत लिया था. इमेज कॉपीरइटदेवेंद्र आगे कहते हैं, "ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वो उसकी पहली
प्रस्तुति थी. मुझे याद है कि वहां मौजूद कला समीक्षक डॉ धीरेंद्र मिश्रा
ने मंच से यह कहा था कि अनुभूति के रूप में भोजपुरी को "तीजनबाई" मिली है.
क्योंकि वह न सिर्फ़ अपनी खनकती आवाज़ में गा रही थी, बल्कि भावमय नृत्य से
सीधे श्रोताओं और दर्शकों के दिलों में उतर भी रही थी.''
तीस्ता की अधिकांश प्रस्तुति छत्तीसगढ़ की लोकगायिका तीजनबाई की
पांडवानी शैली में होती थी. इसमें महिलाएं पुरुषों की कापालिक गायन शैली की
तरह भावमय नृत्य के साथ खड़े होकर प्रस्तुति देती है.
बिहार और
भोजपुरी के लोकगायन के क्षेत्र में 17 साल की एक लड़की अपनी तरह का अनोखा
प्रयोग कर रही थी. इसलिए लोग उसे बिहार की तीजनबाई कहकर पुकारते हैं.
अनुभूति
शांडिल्य यानी तीस्ता के उस पहले प्रदर्शन का क़िस्सा सुनाते हुए देवेंद्र
नाथ तिवारी कहते हैं, "उस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री
रामबहादुर राय भी थे. तीस्ता की प्रस्तुति देखन के बाद भावविभोर हो उठे.
कहने लगे कि भोजपुरी प्रतिभा की खान है. तीस्ता को गाते हुए देखकर ये
विश्वास अब और भी पुख्ता हो गया है. उन्होंने तो उसी दिन ही कह दिया था कि
यह भोजपुरी संस्कृति की सबसे कम उम्र की संस्कृति दूत है, बड़े मंचों की
कलाकार है." Eदिल्ली के पालम स्थित दादा देव ग्राउंड में आयोजित उस कार्यक्रम में
भोजपुरी लोकगायन की पारंपरिक व्यास शैली में कुंवर सिंह की वीरगाथा गाकर
तीस्ता ने उसी दिन कला जगत में अपनी पहचान बना ली थी.
तीस्ता के उस
पहले परफॉर्मेंस के साक्षी रहे देवेंद्र नाथ तिवारी याद करते हुए कहते हैं,
"उतनी कम उम्र में उस बच्ची के लय, ताल, आरोह, अवरोह, भाव, मुद्रा और रस की समझ को देखकर सभी हतप्रभ थे. तीन दिनों तक चले उस कार्यक्रम में अनभूति
ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन बेहद कुशलता से किया था."
महज 17 साल की उम्र में किसी भी लोकगायिका के लिए "बिहार की तीजनबाई"
जैसा उपनाम पा जाना कोई खेल नहीं है. पिता उदय नारायण सिंह के मित्र और
वरिष्ठ पत्रकार निराला बिदेशिया कहते हैं कि "तीस्ता ईश्वरीय देन थी. इतनी
कम उम्र में भी वह बदलाव को महसूस कर रही थी. इसलिए उसने लीक से हटकर
लोकगाथा और लोकगीतों के गायन की परंपरा को चुना."
निराला कहते हैं,
"इतना समझ लीजिए कि भोजपुरी इस समय कला और संस्कृति के मामले में
संकटग्रस्त है. चारों तरफ़ अश्लीलता का भौंडा प्रदर्शन हो रहा है. शारदा
सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, चंदन तिवारी जैसे उंगली पर गिने जाने भर लोग ही
बचे हैं जो भोजपुरी की संस्कृति और कला को स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे
हैं. तीस्ता उन्हीं में से एक थी.''
इतनी कम उम्र में कहां से मिली तीस्ता को इतनी प्रवीणता! इस सवाल का
जवाब यशवंत मिश्रा से बेहतर कौन बना सकता है जो दस दिनों तक पटना एम्स में
भर्ती तीस्ता के साथ हर पल मौजूद रहे और पिता उदय नारायण सिंह का हौसला
बढ़ाते रहे.
वो कहते हैं, ''उदयनारायण ख़ुद एक मंझे हुए लोकगायक और
संगीत के शिक्षक हैं. इस तरह संगीत तो तीस्ता को विरासत में ही मिला था. आप
कह सकते हैं कि वो उदय नारायण सिंह की आवाज़ थी. लोकगाथा और लोकगीतों के
गायन की सीख उसे पिता से ही मिली है. संगीत पिता का होता था और बोल बेटी के
होते थे. दोनों की अद्भुत जुगलबंदी थी.''
पिता उदय नारायण को दो दिन पहले ही मालूम चल गया था कि तीस्ता अब जीवन
की आख़िरी सांस ले रही है. डॉक्टरों ने असमर्थता ज़ाहिर कर दी थी. उन्होंने
बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि पटना एम्स प्रबंधन ने अपनी समर्थता तक हर
संभव कोशिशें की. मगर लगातार बुखार रहने के कारण किडनी और लिवर बुरी तरह
से प्रभावित हो गए थे.
तीस्ता के असमय इस दुनिया को छोड़ कर चले
जाने के मायने उदय नारायण सिंह के लिए बिल्कुल अलग हैं. तीस्ता के गुरु और
पिता की संयुक्त भूमिका निभाने वाले उदय नारायण सिंह को दोहरा सदमा लगा है.
बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि वे तीस्ता के साथ लेकर
कई प्रोजेक्ट्स में लगे थे. गंगा गाथा से लेकर द्रौपदी और कृष्ण गाथा तक
आना बाकी था. अब तीस्ता ही नहीं है तो गाथा कौन गाएगी.